Wednesday, February 27, 2019

हमला अपेक्षित था, कई देश भारत के साथ; पाक चाहकर भी बड़ा कदम नहीं उठा पाएगा’

नई दिल्ली. पाकिस्तान के बालाकोट में जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी ट्रेनिंग कैम्प पर भारतीय वायुसेना की कार्रवाई को लेकर वर्ल्ड मीडिया ने अलग-अलग प्रतिक्रिया दी है। द न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा है कि अगर दोनों देशों ने संयम नहीं बरता तो हालात और बिगड़ेंगे। द गार्डियन ने कहा कि अगर पाकिस्तान ने जंग छेड़ दी तो उसे यह आर्थिक रूप से बहुत महंगी पड़ेगी। वहीं, अल जजीरा ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया कि भारत का यह हमला अपेक्षित था। अगर सऊदी अरब के प्रिंस भारत-पाक के दौरे पर न जाते तो यह हमला और पहले ही हो जाता। चीन के सरकारी मीडिया का कहना है कि कई देश भारत के साथ हैं। मौजूदा हालात को मोदी सरकार ही संभाल सकती है।

1) द न्यूयाॅर्क टाइम्स ने लिखा- दोनों देशों ने अभी भी तनाव कम करने की गुंजाइश छोड़ी

अमेरिकी अखबार द न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा, ‘‘पांच दशक में पहली बार भारतीय वायुसेना के विमान सीमा पार कर पाकिस्तान में घुसे। भारत-पाक एलओसी पर आमतौर पर गोलाबारी करते रहते हैं, लेकिन इस बार हवाई हमला हुआ। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि मौजूदा हालात संभलने की बजाय और बिगड़ रहे हैं। अगर दोनों ने अब संयम नहीं बरता तो यह संकट और गंभीर हो जाएगा। हालांकि, दोनों देशों ने अभी भी तनाव कम करने की गुंजाइश छोड़ रखी है।’’

न्यूयॉर्क टाइम्स ने बालाकोट के रहने वाले एक व्यक्ति के हवाले से लिखा कि मंगलवार तड़के उसे जोरदार धमाकों की आवाजें सुनाई गई थीं। वहीं, डिफेंस इंडस्ट्री पर नजर रखने वाले लंदन स्थित जेन इन्फॉर्मेशन ग्रुप के एनालिस्ट राहुल बेदी के हवाले से अखबार ने लिखा कि पाकिस्तान प्रतिक्रिया देगा, लेकिन इस बार उसकी प्रतिक्रिया पारंपरिक होगी। इस बार वह किसी आतंकी संगठन की तरह प्रतिक्रिया नहीं दे पाएगा।

2) भारत के बयान को मानें तो मौजूदा संघर्ष जंग में नहीं बदलेगा : वॉशिंगटन पोस्ट
अमेरिकी अखबार वॉशिंगटन पोस्ट ने लिखा कि 1971 की जंग के बाद भारत ने एलओसी पार अपने लड़ाकू विमान भेजे। पिछली बार दोनों देशों के बीच ऐसा तनाव 1999 में करगिल की जंग के वक्त पैदा हुआ था। भारत ने कहा है कि उसका निशाना पाकिस्तान की सेना नहीं थी, बल्कि वह जैश-ए-मोहम्मद के खिलाफ कार्रवाई चाहता था। इससे कहा जा सकता है कि मौजूदा संघर्ष अब जंग जैसे हालात में तब्दील नहीं होगा। वहीं, अमेरिका ने 14 फरवरी के हमले के बाद भारत का समर्थन किया है। हमले के दो दिन अमेरिका के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार जॉन बोल्टन ने कहा था कि भारत को आत्मरक्षा का अधिकार है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भी कहा था कि भारत किसी मजबूत कदम के बारे में सोच रहा है।

3) 1971 की जंग के बाद भारतीय विमानों ने पहली बार एलओसी पार की : गार्डियन
ब्रिटिश अखबार द गार्डियन ने अपनी वेबसाइट पर ‘इंडिया लॉन्चेज एयरस्ट्राइक ऑन पाकिस्तान एक्रॉस कश्मीर बॉर्डर’ शीर्षक से दी गई खबर में लिखा, ‘‘1971 के बाद भारत ने पहली बार एलओसी पार की है। लेकिन इस बारे में पाकिस्तान का दावा है कि उसे कोई नुकसान नहीं हुआ। हालांकि, भारत में इस हमले को लेकर बड़े पैमाने पर जश्न मनाया गया। भारत की इस कार्रवाई से 14 फरवरी को हुए फिदायीन हमले के बाद जनता में उबल रहे गुस्से को शांत करने में जरूर मदद मिली होगी।’’

गार्डियन ने ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के रिसर्च फैलो खालिद शाह के हवाले से लिखा कि अगर पाकिस्तान जंग में कूदा तो उसके लिए खेल एकदम बदल जाएगा। उसे यह जंग आर्थिक रूप से बहुत महंगी पड़ेगी।

4) चीन के मीडिया ने भी माना- भारत का हमला कामयाब रहा
चीन के सरकारी मीडिया चायना डेली ने अपनी वेबसाइट में लिखा कि पाकिस्तान का यह कहना है कि भारतीय विमानों ने एलओसी पार की है। वहीं, चीन की सरकारी न्यूज एजेंसी शिन्हुआ ने भारतीय सेना के एक उच्च पदस्थ सूत्र के हवाले से लिखा कि भारत ने 20 मिनट हवाई कार्रवाई की और यह ऑपरेशन कामयाब रहा है।

5) हमला अपेक्षित था, लेकिन सऊदी प्रिंस के दौरे की वजह से टल गया था : अल जजीरा
अल जजीरा ने लिखा कि भारत ने पाकिस्तान को मजबूत संकेत दे दिए हैं। कश्मीर में हमले के बाद भारत की सरकार पर बहुत ज्यादा दबाव था। हमला अपेक्षित था। लेकिन इसमें देरी की वजह यह थी कि सऊदी अरब के प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान पहले पाकिस्तान और फिर भारत के दौरे पर थे। हर कोई जानता था कि जल्द ही कुछ होने वाला है।

6) पाक चाहकर भी जवाबी कार्रवाई नहीं कर सकता क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत मजबूत- गल्फ न्यूज

गल्फ न्यूज ने लिखा कि पाकिस्तान सेना ने भी पहले मान लिया था कि भारतीय विमान उसके क्षेत्र में आकर चार बम गिरा गए हैं। हालांकि बाद में पाकिस्तान ने भारत की कार्रवाई को ज्यादा तवज्जो नहीं दी। मौजूदा हालात बताते हैं कि पाकिस्तान चाहकर भी जवाबी कार्रवाई नहीं कर पाएगा, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की स्थिति मजबूत है। उसने इस हमले के साथ दुनिया को बता दिया है कि अगर उसके सैनिकों पर नृशंस हमला होता है तो वह चुप नहीं बैठेगा।

7) ईरान के अखबार तेहरान टाइम्स ने अपनी वेबसाइट पर अजीब तर्क दिए हैं। उसने लिखा कि भारतीय मीडिया अमेरिका के हाथों में खेल रहा है। वहीं, अमेरिका भारत और चीन के बीच तनाव बढ़ा रहा है। 

8) कई देश भारत के साथ, मोदी सरकार ही संभाल सकती है हालात : ग्लोबल टाइम्स
चीन के अखबार ग्लोबल टाइम्स ने लिखा कि अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी और ऑस्ट्रेलिया भारत के साथ खड़े हैं। साफ है कि वे चाहते हैं कि भारत-पाक के बीच तनाव बढ़े और इस तरह चीन को दबाव में लाया जा सके। अगर भारत ने इससे आगे कुछ किया तो भारत-पाक के बीच सैन्य संघर्ष अब तक के सबसे बड़े स्तर पर पहुंच जाएगा। इस हालात को संभालना अब सिर्फ मोदी सरकार के हाथ में है।

Thursday, February 21, 2019

आतंक की मल्टीनेशनल कंपनी के सीएफओ बनेंगे इमरान खान?

पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था बीते एक साल से गंभीर कर्ज संकट के दौर से गुजर रही है. इस कर्ज संकट से उसे बाहर निकालने के लिए अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) पाकिस्तान सरकार को निशुल्क आर्थिक सलाह के साथ-साथ एक बड़े बेलआउट पैकेज का प्रावधान कर सकती है. लेकिन प्रधानमंत्री इमरान खान अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए क्रिकेट की 20-20 रणनीति का सहारा लेते हुए सउदी अरब, यूएई और चीन जैसे मित्र देशों से बड़ा कर्ज लेकर कर्ज संकट को टालने की तैयारी कर चुके हैं.

प्रधानमंत्री बनने के बाद अपने पहले रियाद दौरे पर इमरान खान 6 बिलियन डॉलर लेकर आए और अब सऊदी अरब के प्रिंस सलमान ने पाकिस्तान को अतिरिक्त 20 बिलियन डॉलर की रकम बतौर कर्ज देने का ऐलान किया है. इसके अलावा यूएई सरकार से इमरान खान गोपनीय कर्ज ले चुके हैं और कर्ज की इस रकम का खुलासा नहीं किया जा रहा है. इसके अलावा पाकिस्तान सरकार अपने कर्ज संकट से निकलने के लिए चीन सरकार से भी कुछ नए कर्ज की उम्मीद लगाए बैठी है.

क्या सऊदी अरब से पाकिस्तान को निवेश के नाम पर मिल रहा नया कर्ज उसे आर्थिक संकट से बाहर निकालेगा या फिर यह कर्ज पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को ऐसे गर्त में ढकेलेगा जिससे निकलना उसके लिए मुश्किल ही नहीं नामुमकिन हो जाएगा? गौरतलब है कि यह पहला मौका नहीं है जब सऊदी अरब की मदद पाकिस्तान के भविष्य को अंधकार में ढकेलने जा रहा है.

गिरता रुपया-बढ़ती महंगाई, पाक की गिरती इकोनॉमी को संभाल पाएंगे इमरान?

शीत युद्ध के दौरान अफगानिस्तान में रूस के प्रभाव को सीमित करने के लिए भी सऊदी अरब ने अमेरिका की शह पर पाकिस्तान को बड़ी आर्थिक मदद पहुंचाई. यह मदद भी पाकिस्तान को आर्थिक निवेश के तौर पर मिली और नतीजा बीते चार दशक से पाकिस्तान की अवाम भुगत रही है. इस निवेश ने पाकिस्तान में आतंक की पहली फैक्ट्री स्थापित की और इस फैक्ट्री के पहले सीईओ जनरल जिया-उल-हक थे. लिहाजा, क्या एक बार फिर पाकिस्तान ने सऊदी अरब का रुख आतंक की इस फैक्ट्री को मल्टीनेशनल कॉरपोरेशन में तब्दील करने के लिए किया है और अब इस एमएनसी के पहले सीएफओ इमरान खान बनेंगे?

गौरतलब है कि सऊदी अरब का कर्ज किसी देश को मुफ्त नहीं मिलता. इसका सबसे बड़ा गवाह खुद पाकिस्तान है. ग्लोबल रेटिंग एजेंसी मूडीज एक साल से अधिक समय से पाकिस्तान को कर्ज संकट में फंसने से बचने की चेतावनी दे रहा है. मूडीज इन्वेस्टर्स सर्विस के मुताबिक पाकिस्तान के सामने चुनौतियों में उच्च सरकारी ऋण बोझ, कमजोर भौतिक व सामाजिक बुनियादी ढांचा, कमजोर बाह्य भुगतान स्थिति और उच्च राजनीतिक जोखिम शामिल है.

पाकिस्तान सरकार पर लगभग 78.46 बिलियन डॉलर का बाह्य कर्ज है. यह कर्ज पाकिस्तान की जीडीपी का 28.3 फीसदी है. वहीं दिसंबर 2018 तक पाकिस्तान पर कुल बाह्य कर्ज 99 बिलियन डॉलर का है जो कि उसकी जीडीपी का 35.8 फीसदी है. इस कर्ज को और खतरनाक पाकिस्तान का विदेशी मुद्रा भंडार बना रहा है क्योंकि उसके पास विदेशी मुद्रा में महज 8.2 बिलियन डॉलर की रकम है. इसके अलावा मौजूदा वित्त वर्ष में पाकिस्तान सरकार का चालू खाता घाटा भी लगभग 8 बिलियन डॉलर के स्तर पर है. इन आंकड़ों से अंदाजा लगाया जा सकता है कि  पाकिस्तान कर्ज के किस टाइम बम पर बैठा हुआ है.

सही कहा इमरान, लेकिन भारत नहीं सिर्फ PAK के लिए मूर्खता है परमाणु युद्ध की सोच

इस आर्थिक स्थिति के बीच पाकिस्तान सरकार के सामने चाइना पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (सीपीईसी) का नया संकट खड़ा है. चीन के साथ हुए समझौते के मुताबिक 2020 से पाकिस्तान सरकार को प्रोजेक्ट में अपने हिस्से का निवेश करना है और चीन से लिए गए कर्ज का ब्याज भी अदा करना है. विकट कर्ज संकट को देखते हुए इमरान खान बीजिंग का दौरा कर चुके हैं. जाहिर है चीन से कर्ज में किसी राहत के एवज में पाकिस्तान को इस कॉरिडोर में चीन के अधिकारों में इजाफा करने का एकमात्र विकल्प है.

ईरान के साथ फिर खड़ा होगा भारत, रुपया-रियाल में हो रहा ट्रेड
गौरतलब है कि ईरान का पड़ोसी होने के चलते सऊदी अरब के लिए पाकिस्तान बेहद महत्वपूर्ण है. पाकिस्तान को  सऊदी अरब से वित्तीय मदद की शुरुआत 1980 में हुई. इस वित्तीय मदद का रास्ता साफ करने में कुछ कारणों का अहम योगदान रहा है. पहला, 1977 में प्रधानमंत्री जुल्फीकार अली भुट्टो का तख्तापलट करते हुए जनरल जिया उल हक का सत्ता पर काबिज होना. इसके बाद 1979 में ईरान की इस्लामिक क्रांति और उसी साल अफगानिस्तान पर सोवियत संघ का कब्जा होने के चलते पाकिस्तान का महत्व साउदी अरब के साथ-साथ अमेरिका के लिए भी बेहद अहम हो गया.

6 गुना हो जाता भारत-पाक ट्रेड, बस आतंकवाद से मुंह मोड़ लेते इमरान!

शीत युद्ध के इस दौर में जहां अमेरिका पाकिस्तान को आर्थिक मदद देकर अफगानिस्तान में सोवियत संघ के प्रभाव को खत्म करना चाहता था वहीं इस्लामिक जगत में अपने कट्टर प्रतिद्वंदी ईरान को शिकस्त देने के लिए सउदी अरब ने पाकिस्तान को आर्थिक मदद का रास्ता साफ किया. अमेरिकी शह पर सऊदी अरब के निवेश से पाकिस्तान में आतंक की पहली फैक्ट्री की नींव रखी गई और इस फैक्ट्री से निकल रहे आतंकवाद का इस्तेमाल अमेरिका ने सोवियत संघ तो सऊदी अरब ने ईरान के खिलाफ किया. 

मौजूदा समय में एक बार सऊदी अरब और अमेरिका के निशाने पर ईरान है. जहां अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा की ईरान से संधि की कवायद को दरकिनार करते हुए उसे न्यूक्लियर टेक्नोलॉजी से दूर रखने का फैसला लिया है. वहीं सऊदी अरब इस्लामिक जगत में ईरान के प्रभाव को सीमित करने के लिए खुद अमेरिका से न्यूक्लियर टेक्नोल़ॉजी की उम्मीद लगा रहा है. ऐसे में एक बार फिर पाकिस्तान का महत्व दोनों देशों के लिए अहम है.